सोमवार, 11 जनवरी 2016

17140 पर पद्यरचना

17140 पर पद्यरचना
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"संघे शक्ति कलियुगे",
उक्ति ये पढी पुरानी थी ।
खूब लडे थे नेता संघी,
ये हमने सुनी कहानी थी ।।

शिक्षक की मान मर्यादा,
या मुद्दा हो पेंशन का ।
अधिकारों की रक्षा करते ,
ससम्मान वेतन का ।।

माला बनाई पिरोई उसमे ,
अधिकारों की मोती ।
हर सम्मान पा लिया उन्होने ,
ले छडी पहनके धोती ।।

जिन खोजा तिन पा लिया ,
गहरे पानी पैठ ।
'शिक्षक संघ' प्रभावी था तब ,
एक चटाई बैठ ।।

कर्मठ त्यागी थे वो नेता ,
इरादों मे केवल जीत ।
मन को ठंडक पहुंचाते ज्यों ,
'भूले बिसरे गीत' ।।

पर हाय जमाना आया अब तो ,
ऐसे ऐसे नेता ।
भंग न होवे निद्रा उनकी ,
ज्यों 'कुम्भकरण के पोता' ।।

समय आ गया वर्तमान का ,
ऐसा विकट कराल ।
गली गली नेता मिलें,
आपस मे करें धमाल ।।

तू-तू मै-मै करते रहते,
खुद को असली बताएं ।
नित-नित उगते नेता देख ,
'कुकुरमुत्ता' भी घबराए ।।

लिस्ट लम्बी समस्याओं की ,
धक्के खाते शिक्षक ।
खाय कमीशन लिए डकार ,
रक्षक ही बन बैठे भक्षक ।।

भला किसी का कर न सके ये ,
करते सबका अमंगल ।
'श्वान' महोदय खुद शरमाएं ,
देखके इनका दंगल ।।

चंदा जुटाकर भरते पेट,
खाते नही अघाते ।
डींग हांकते, मौज उडाते ,
फूले नही समाते ।।

बर्बाद गुलिस्तां करने को ,
जब एक ही 'उल्लू' काफी है ।
हर शाख पे 'उल्लू' आ बैठे ,
अंजाम ही कहना गुस्ताखी है ।।

लुट गया झण्डा फटी चटाई ,
नजर गडी हर पीस पर ।
उठो बन्धुओं जग जाओ अब ,
'सत्रह एक सौ चालीस' पर ।।

अब न जगे तो कब जगोगे ,
हाय कट गई लुटी पतंग ।
नोच बकोट ले भगे ये नेता ,
संघदेह का अंग अंग ।।

खुद खा खाकर डकार रहे ,
पेट पे फेरे हाथ ।
नही तनिक फिकर अनुजों की ,
कहें 'हम हैं न आपके साथ' ।।

आज नही कल मिल जाएगा ,
परसों या फिर अगले दिन ।
रोज हमे यूं हीं थपकाते,
ज्यों 'थपकी मां देती हर दिन' ।।

चंद 'लाल बुझक्कडों' ने,
ऐसा बुझाया जाल ।
'टेढी-सीधी' के उलझन मे ,
फंसा दिया बवाल ।।

आज नियुक्ति पाने वाला ,
हमसे ज्यादा पायेगा ।
पहले से हम उसी जगह ,
सम्मान कहां रह जाएगा ?

किसका नाम रहेगा पहले ,
पदोन्नति कौन पाएगा ?
भला बताओ हम दोनो मे ,
वरीय कौन कहलाएगा ?

नियम कहां का ये भला,
कुछ खाएंगे सब ताकेंगे ।
पता न था 'सरकार' परोस ,
छीनकर फिर हांकेंगे ।।

याचना तो नही की थी हमने ,
तुमने दिया ही था क्यूं ?
जब दिया तो दिया 'सरकार' ,
फिर ले लिया वापस क्यूं ?

लागू होगा 'सातवां वेतन' ,
चन्द दिवस शेष हैं अब ।
उससे पूर्व नही मिला तो ,
भूल जाओ घर बैठो तब ।।

पेंचर होगी 'साइकिल' और ,
टूटेगी रिंग व तिल्ली ।
गरज के साथ बरस पडो अब ,
चलो लखनऊ,दिल्ली ।।

'सत्रह एक सौ चालीस' 'वेद' ,
सम्मान जो हमको दिलाएगा ।
संघर्ष करेगा ऐश नही,
वो नेता हमारा कहलाएगा ।।

17140 पर आंदोलित
                        'वेद'

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