एक निरर्थक रचना -
"आ जग को अब आग लगा दें"
हरा भरा इक बाग लगा दें ।
फूल फल और साग लगा दें ।
नवरस वाला राग लगा दें ।
रत्नजड़ित इक नाग लगा दें ।
जोड़ घटा व भाग लगा दें ।
बिन पंखों का काग लगा दें ।
साबुन वाला झाग लगा दें ।
कपड़े में फिर ताग लगा दें ।
रंगबिरंगा दाग लगा दें ।
होली वाला फाग लगा दें ।
हवनकुण्ड में याग लगा दें ।
ऐसी घटिया रचनाओं से ,
चल जग को अब आग लगा दें ।।
अब थोड़ी सार्थकता -
आतंक के साये मे जग है ,
छल-कपट के हाय में जग है ।
भूख भय और भ्रष्टाचार से ,
आकण्ठ डूब चुका जग है ।।
ऐसे जग में पहुंच गए हम ,
मानवता पर जो दाग लगा दे ।
बहुत हो गया बन्द करो अब ,
आ जग को अब आग लगा दें ।।
"वेद"
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