सोमवार, 11 जनवरी 2016

तुम जीते मैं हार गया/गयी

"तुम जीते मैं हार गया/गयी"

पत्नी उवाच-

नहीं एक सुनी तुमने मेरी ,
नहीं लाकर मुझको हार दिया ।
पड़ोसन जैसी सैन्डल मांगी ,
पर वह भी अस्वीकार दिया ।।

जन्मदिवस पर भी तुमने ,
बस सस्ता सा उपहार दिया ।
ख्वाहिशें पूरी कर न सके ,
मेरी चाहत पर प्रहार किया ।।

चली मायके छोड़के लो ,
तुम्हारा मैं घर-बार गई ।
नहीं चला मेरा वश लो ,
तुम जीते मैं हार गई ।।



पति उवाच -

महंगाई डायन के रहते ,
संतुष्ट तुम्हें नहीं कर सकता ।
लाचारी समझो तनिक प्रिये !
हर कष्ट नहीं मैं हर सकता ।

कर्ज के बोझ तले हूं कैसे ,
करुं ख्वाहिशें सब पूरी ?
कोशिश करूंगा हरसंभव ,
पर यूं न बढ़ाओ अब दूरी ।।

जीवन मेरा अर्पित तुम्हें ,
क्या यह उपहार बेकार गया ?
जब-जब गई खिसियाकर तुम ,
मैं लाने तुम्हें हर बार गया ।।

महंगाई का मारा मैं ,
लो दासता स्वीकार गया ।
छोड़के यूं मत जाओ प्रिये !
लो तुम जीती मैं हार गया ।।

                 "वेद"
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