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शुक्रवार, 22 जनवरी 2016

चीन व पाक को ललकार

आंख न खुलती पूरी जिसकी ,
कान खोल कर सुन लो चीन ।
नजर गड़ाना बन्द करो तुम ,
सीमा पर बेसुरी बीन ।।

नकली माल खिलौने बेच ,
महाशक्ति का दम हो भरते ।
नही खरीदें हम तो तुम ,
तिल-तिल क्यूं फिर हो मरते ।।

आतंकियों का पक्ष हो लेते ,
धूमिल किया बुद्ध का नाम ।
नेपाल-पाक-श्रीलंका में ,
करते नाहक हमको बदनाम ।।

                   "वेद"
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मुम्बई , पठानकोट बहुत हुआ ,
अब और नही हम सह सकते ।
करो कठोर कार्यवाही ,
अब और नहीं हम कह सकते ।।

पाकिस्तान होश मे आओ ,
बेहोश हमेशा रहते हो ।
होश ठिकाने करलो खुद ,
मदहोशी मे बहते हो ।।

कान खोलके सुनलो जब ,
आंख हमारी उठ जाएगी ।
नही बचोगे मानचित्र पर ,
साख तुम्हारी मिट जाएगी ।।

इतिहास मे नाम जरूर मिलेगा ,
पर ग्लोब से हम मिटा देंगे ।
ढूंढते रह जाओगे अबकी ,
कब्र नही हम चिता देंगे ।।

                    "वेद"
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सोमवार, 11 जनवरी 2016

शब्दों के सौदागर


1-

जिनको खोज रहे हो 'वेद' ,
वो यहीं तुम्हारे पास हैं ।

विविध विधा मे पारंगत ,
सब काव्यता के दास हैं ।

'शब्दों के सौदागर' बसते यहां,
यह बस्ती ही कुछ खास है ।

अचरज है जल में रहके भी,
मछली को प्यास है ।।

2-

ऐ 'शब्दों के सौदागर'
गर सौदा है मंजूर तुझे ;

कर सौदा दास हूं मै ,
नहीं शब्दों का आभास मुझे ।

शब्दकोष के शब्द से वंचित अपवंचित चितचोर नहीं ;

है मंजूर मुझे भी पर ,
निःशब्द मै , शब्दसराबोर नही ।।

        "वेद"

तुम जीते मैं हार गया/गयी

"तुम जीते मैं हार गया/गयी"

पत्नी उवाच-

नहीं एक सुनी तुमने मेरी ,
नहीं लाकर मुझको हार दिया ।
पड़ोसन जैसी सैन्डल मांगी ,
पर वह भी अस्वीकार दिया ।।

जन्मदिवस पर भी तुमने ,
बस सस्ता सा उपहार दिया ।
ख्वाहिशें पूरी कर न सके ,
मेरी चाहत पर प्रहार किया ।।

चली मायके छोड़के लो ,
तुम्हारा मैं घर-बार गई ।
नहीं चला मेरा वश लो ,
तुम जीते मैं हार गई ।।



पति उवाच -

महंगाई डायन के रहते ,
संतुष्ट तुम्हें नहीं कर सकता ।
लाचारी समझो तनिक प्रिये !
हर कष्ट नहीं मैं हर सकता ।

कर्ज के बोझ तले हूं कैसे ,
करुं ख्वाहिशें सब पूरी ?
कोशिश करूंगा हरसंभव ,
पर यूं न बढ़ाओ अब दूरी ।।

जीवन मेरा अर्पित तुम्हें ,
क्या यह उपहार बेकार गया ?
जब-जब गई खिसियाकर तुम ,
मैं लाने तुम्हें हर बार गया ।।

महंगाई का मारा मैं ,
लो दासता स्वीकार गया ।
छोड़के यूं मत जाओ प्रिये !
लो तुम जीती मैं हार गया ।।

                 "वेद"
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शिक्षामित्र-व्यथा कथा

।। अथ शिक्षामित्र-व्यथा कथा ।।

सुनो मानवों गहन मनन से,
कहता अपनी कहानी हूं ।
इसी धरती के भारत देश का,
मै भी एक प्राणी हूं ।।

उत्तर प्रदेश के गांव-गांव मे,
सहज ही पाया जाता हूं ।
स्कूल मे शिक्षणरत हां मै,
शिक्षामित्र कहलाता हूं ।।

चौदह साल व्यतीत किए ज्यों,
राम ने काटा था वनवास ।
मैने भी इतने वर्षों तक,
सेवा दी लेकर इक
आस ।।

अल्प मानदेय पाकर भी,
मनोयोग से शिक्षण कार्य किया ।
गणना,चुनाव,पल्स पोलियो,
आदि सभी मे प्रतिभाग लिया ।।

कर्मों मे मेरे इतने बरस,
नहीं खोट किसी ने निकाला था ।
आना जाना समय से था,
स्कूल का खोलता ताला था ।।

प्रशिक्षण देकर सत्ता ने,
जब सहायक अध्यापक बना दिया ।
बरसों से मेरी मांग थी जो,
उसे पूरा करके गिना दिया ।।

अब मेरे दुर्दिन दूर हुए,
घर खुशियों का त्यौहार मना ।
चहुं ओर मिठाई बांटी थी,
घर मे उमंग का वास बना ।।

मै भी खुश बच्चे भी खुश,
पितुमात न फूले समाए थे ।
जो बन्धु दूर हो गए थे हमसे,
वो भी करीब अब आए थे ।।

सुखमय जीवन चलने लगा,
पर यह विधि को मंजूर न था ।
बेखबर था कि नजर लगेगी,
कोर्ट का फैसला दूर न था ।।

समायोजन रद्द किया कोर्ट ने,
सपने सब चकनाचूर किए ।
भूचाल आ गया जीवन मे ,
आघात हृदय मे भरपूर दिए ।।

मेरा तो चमन उजड गया,
वीरान हो गया जीवन था ।
काठ कलेजा हो गया,
टूट चुका सबका मन था ।।

परलोक सिधारे कुछ साथी,
बीमार हुए,सब हताश हुए ।
शेष बचे जो तिल-तिल वो ,
मरने को जिन्दा लाश हुए ।।

रुको साथियों यूं न जाओ ,
पीछे घर-परिवार तुम्हारा ।
सोचो जरा तो बीबी बच्चों का ,
कौन बनेगा इनका सहारा ?

माना कि दूर दूर तलक,
गहन अंधेरा छाया है ।
कहीं धूप कहीं पर छाया है ,
सब यही प्रभु की माया है ।।

वह जीवन ही क्या जीवन है ,
जिसमे संघर्ष का मेल न हो ।
उठो,लडो,मत झुको साथियों !
भले चाहे क्यों जेल न हो ।।

ललकार उठो शंखनाद करो ,
सुने सत्ता अखिल प्रदेश की ।
पोंछ के आंसू करो चढाई ,
हिल उठे गद्दी भी देश की ।।

नही चाहिए महल अटारी ,
जीने का अधिकार ही दे डालो ।
या तो जिला दो महामहिम ,
या इच्छामृत्यु ही दे डालो ।।

उत्तम प्रदेश कहने वालों !
क्यों मुझको गिरा दिया तम मे ?
सोची समझी चाल थी क्या ?
जो डुबो दिया मुझको गम मे ।।

विधिवेत्ता की कमी थी क्या ?
या खोट तुम्हारे एतबार मे ?
अनगिनत छेद कर डाले नाव मे ,
डुबो दिया मंझधार में ।।

टीईटी,बीटीसी वालों !
बिगाडा मैने क्या तुम्हारा था ?
नहीं रहा जो मेरा बन्धु भी ,
किसी की आंख का तारा था ।।

चिता जलाकर क्या उस पर ,
रोटी सेंककर खाओगे ?
इंसानियत नही रही क्या ?
जो मातम पर जश्न मनाओगे !!

जियो और जीने दो क्या ?
यह तुम पाठ भूल गए ?
मुझे मारकर करोगे सेवा ,
मानवता के प्रतिकूल गए !!

नही मरेंगे,जियेंगे अब,
यही "वेद"हमारा प्रण होगा ।
सत्ता के प्रतिष्ठान सुनो,
याचना नहीं अब रण होगा ।।

समर्थन----
भाटपार का शिक्षक संघ ,
हर कदम पर साथ रहेगा ।
प्रदेश व जिला इकाई "वेद" ,
पूर्ण समर्थन करेगा ।।
वादा है साथ निभाएंगे,
इरादे हमारे नेक हैं ।
जय शिक्षक-
जय शिक्षामित्र !
आवाज दो हम एक हैं ।।

आपके विचारों की प्रतीक्षा मे "वेद"